तेरे खामोशी में छुपी जो बाते है
मेरे शांत मन के लहरों को
कुछ अलग मोड़ ले जाती है…
Author: Writebits
अनजान
इस आईने में
कौन अनजान खड़ा है
कुछ देखा सा
पराया इंसान
मेरी प्रतिमा में गढ़ा है…
जिंदगी
वक्त निकल जाता है
अपनों के लिए
पर वक्त से अपनापन आये
जरुरी नहीं…
अपने ना हो पाते थे…
क्या बताती, क्यो बताती
और होता क्या?
जन्नत
ख़ामियों ने रोके रख्खा है
वरना उड़ान भर लेते…
मैं तैरती रहती हूँ
मुझे कुछ पता नहीं
क्या सही क्या गलत…
कही से
बस खो जाती हूँ खयालो में
और कहि से
साथ तुम हो
आज पीछे मुड़ के देखा तो
सब सही नजर आता है
क्यों की आज साथ तुम हो…
