सुकून है… चैन है…
ख़ुशी है… जिंदगी है…
बस…
सुकून है… चैन है…
ख़ुशी है… जिंदगी है…
बस…
कुसूर तो जज्बातो का है
जो ओस की बूंदो की तरह
तुमसे लिपटे है…
तेरे खामोशी में छुपी जो बाते है
मेरे शांत मन के लहरों को
कुछ अलग मोड़ ले जाती है…
इस आईने में
कौन अनजान खड़ा है
कुछ देखा सा
पराया इंसान
मेरी प्रतिमा में गढ़ा है…
वक्त निकल जाता है
अपनों के लिए
पर वक्त से अपनापन आये
जरुरी नहीं…
क्या बताती, क्यो बताती
और होता क्या?
ख़ामियों ने रोके रख्खा है
वरना उड़ान भर लेते…
मुझे कुछ पता नहीं
क्या सही क्या गलत…