सुलगती रातो में
रोते हुए दिल को थामे…
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ख़ुशी
लोग बहोत खुश है
बहोत कुछ पा कर
पर…
ऐसे मोके पे…
ऐसे मोके पी मत पूछना
जब मिजाज रंगीन हो…
मुसाफिर
अक्सर खुदा के सामने
वो झुकते है…
अहम् ब्रह्मास्मि
सागर से गहरी मैं हूँ
परबत से ऊँची मैं
ज्वाला सी गरम मैं हूँ…
शुरुवात
जहा पे दर्द है
वही इक आस है
जहा पे ख़ामोशी
कश्मकश साथ है…
अकेलापन
चाहती हूँ
कुछ कर गुजर जाऊ
जिंदगी के जलसे में!!!
पर…
अजीज़
मेरी बिखरी सी जिंदगी
शायद कभी न जुड़े…
