खुदसे खुदको जीत चुकी हूँ
हाँ मैं जीना सीख़ चुकी हूँ…
Tag: shayri
रिश्ते
नाम क्यों देने है रिश्तो को…
“मैं “
सुकून है… चैन है…
ख़ुशी है… जिंदगी है…
बस…
बेक़सूर
कुसूर तो जज्बातो का है
जो ओस की बूंदो की तरह
तुमसे लिपटे है…
ख़्वाब
तेरे खामोशी में छुपी जो बाते है
मेरे शांत मन के लहरों को
कुछ अलग मोड़ ले जाती है…
अनजान
इस आईने में
कौन अनजान खड़ा है
कुछ देखा सा
पराया इंसान
मेरी प्रतिमा में गढ़ा है…
जिंदगी
वक्त निकल जाता है
अपनों के लिए
पर वक्त से अपनापन आये
जरुरी नहीं…
अपने ना हो पाते थे…
क्या बताती, क्यो बताती
और होता क्या?
