ख़ामियों ने रोके रख्खा है
वरना उड़ान भर लेते…
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मैं तैरती रहती हूँ
मुझे कुछ पता नहीं
क्या सही क्या गलत…
कही से
बस खो जाती हूँ खयालो में
और कहि से
साथ तुम हो
आज पीछे मुड़ के देखा तो
सब सही नजर आता है
क्यों की आज साथ तुम हो…
पराया
चल रहे
वक्त के हातो में हात थामे
हालात के रास्ते…
कौन
ये ख़्वाब कहा से आते है
कौन उन्हें जगाता है…
अपने तो हम…
अपने तो हम कभी न थे…
ऐ ख़ुदा
ऐ ख़ुदा
मैं तुझे कहा कहा ढूंढ़ती हूँ…
